आशु गर्ग गाजियाबाद
गाजियाबाद। विकास प्राधिकरण का खेल भी निराला है यहां खानापूर्ति के लिए कार्यवाही तो की जाती है सील भी लगाई जाती है पीला पंजा भी चलाया जाता है लेकिन मिठाई पहुंचने के बाद हर काम संभव हो जाता है।ताजा मामला गाजियाबाद के जोन 4 के महिंद्रा एंक्लेव शैलेंद्र पब्लिक स्कूल के पास की एक इमारत का है जहां गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा सील लगा दी गई बावजूद इसके इमारत में पूरे दिन काम चलता रहता है ऐसे में सवालिया निशान खड़ा होता है कि आखिर इमारत में चल रहे काम में किसका हाथ है महिंद्रा एंक्लेव में बन रही इमारत इस बात का सबूत है कि गाजियाबाद विकास प्राधिकरण में यदि आप आप साठ गांठ कर पाते हैं तो आपका हर काम संभव है।
ये इमारत बताती है की मिठाई खाने के बाद नियमावली/कानून को किस तरह से दरकिनार किया जा सकता है,तमाचा मारती ये इमारत इस बात का जीता जागता सबूत है। तभी तो भूतल बन जाने पर जहां एक ओर तो दिखावे को सील लगी है फिर भी दूसरी ओर सील लगने के बाद प्रथम तल भी बड़े आराम से दिनदहाड़े गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के अधिकारियों के नाक के नीचे बनाया जा रहा है। और तो और इसी सील लगी हुई इमारत के पास इसी तरह की एक और इमारत तैयार हो रही है परंतु अभी उसमें कोई सील नहीं लगी है ऐसा लगता है ।

इस इमारत को बनवाने के एवज में पूरी मिठाई का डिब्बा एक साथ लिया जा चुका है तभी तो ये खुलेआम बन रही है और अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है और लगता है होगी भी नहीं। स्थानीय निवासियों की माने तो इमारत पर सील लगी है पर काम क्यों और कैसे चल रहा है किसके सहारे चल रहा है इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है लेकिन जो पूरे दिन काम हो रहा है सभी को दिखता है आपको बताते चले ये इमारत बिना नक्शा पास कराए, बिना अनुमति और नियमों की पूरी धज्जियाँ उड़ाते हुए बनाई जा रही है।(जीडीए की नाक के नीचे चल रहा खेल) गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) और ज़ोनल टीम की लापरवाही (या मिलीभगत) अब खुलकर सामने आ रही है।बड़ा सवाल ये उठता है जब जीडीए का ज़ोनल स्टाफ़ रोज़ाना इलाके का निरीक्षण करता है तो ये दो मंज़िला निर्माण उनकी नज़रों से कैसे बचा?स्थानीय सूत्रों का कहना है कि जीडीए के नाक के नीचे और जेई(ज़ोनल इंजीनियर) की मिलीभगत से ये सांठ-गांठ का खेल जारी है।विकास प्राधिकरण द्वारा सील लगाने के बाद भी काम नहीं रुका, बल्कि दूसरी मंज़िल पर लेंटर डालने की तैयारी तक शुरू हो गई है।
लोगों का तंज़ है अब तो लगता है जीडीए के दफ़्तर में आराम से सोया जा सकता है, क्योंकि ज़मीन पर अवैध निर्माण खुलेआम बढ़ रहा है।राजस्व पर डाका – बिल्डर, अफ़सर की सांठगांठ-विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के निर्माण सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व नुकसान पहुँचा रहे हैं,न विकास शुल्क जमा,न नक्शा पास — सीधे जनता से मोटी रकम लेकर बिल्डर अपनी जेबें भर रहे हैं।सूत्रों का कहना है कि ज़ोनल इंजीनियर (JE) और सुपरवाइज़र की मिलीभगत के बिना ये संभव ही नहीं।कर्मचारी निरीक्षण के नाम पर आँखें मूँद लेते हैं और बदले में मोटी रकम वसूलते हैं।ये केवल बिल्डर माफ़िया की करतूत नहीं, बल्कि “बिल्डर + अफ़सर की गहरी गठजोड़ का हिस्सा है। (महायोजना-2031 पर भी खतरा ऐसी इमारतों से) गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण की महायोजना-2031 शहर को व्यवस्थित विकास देने के लिए बनी थी,परंतु इस तरह के अवैध निर्माण योजना की रीढ़ तोड़ रहे हैं।
बिना पार्किंग और संकरी गलियों में उठती ऊँची इमारतें ट्रैफिक जाम, बिजली-पानी संकट और सुरक्षा खतरे बढ़ा रही हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अब सख़्त कार्रवाई नहीं हुई, तो महायोजना-2031 केवल काग़ज़ों तक सीमित रह जाएगी। (जनता का ग़ुस्सा और डर) महिंद्रा एंक्लेव के स्थानीय निवासी लगातार शिकायत कर रहे हैं कि ये निर्माण खुली मिलीभगत का खेल है।जो आवाज़ उठाता है, उसे डराया-धमकाया जाता है।
निवासियों की मांग है कि
ऐसे अवैध निर्माण को तुरंत रोका जाए और दोषी बिल्डर व कर्मचारियों पर FIR दर्ज हो। (जनता की एक मांग) कानून सब पर बराबर लागू हो
अब सवाल यह है — जब जनता को खतरा है और सरकार को नुकसान,
तो कार्रवाई कब होगी?
क्या प्रशासन केवल दिखावे की कार्रवाई करेगा या सच में सख़्ती दिखाएगा? (गाज़ियाबाद की जनता का कहना है) भरोसा तभी लौटेगा जब कानून सब पर बराबरी से लागू होगा,अन्यथा ऐसी इमारतें शहर की पहचान को बदनाम करती रहेंगी।






