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राष्ट्रीय पृथ्वी विज्ञान अध्ययन केंद्र, तिरुवनंतपुरम (केरल) में “अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) में सुगमता” पर आठवीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन

एनसीईएसएस के निदेशक प्रो. एनवी चलपति राव के स्वागत भाषण से सत्र की शुरुआत हुई

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Sunday, November 2, 2025

The session began with a welcome address by Prof. NV Chalapathi Rao, Director, NCESS

नई दिल्ली। नीति आयोग द्वारा 30-31 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय पृथ्वी विज्ञान अध्ययन केंद्र , तिरुवनंतपुरम में ‘‘अनुसंधान और विकास में सुगमता’’ पर 8वीं क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन किया गया। परामर्श में भारत के अनुसंधान और विकास इकोसिस्‍टम को सुदृढ़ बनाने और विचार-विमर्श करने के लिए संस्थागत नेताओं, कुलपतियों और वैज्ञानिक मंत्रालय/विभागों का एक प्रतिष्ठित समूह एक साथ आया।

एनसीईएसएस के निदेशक प्रो. एनवी चलपति राव के स्वागत भाषण से सत्र की शुरुआत हुई, जिन्होंने वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए एक अनुकूल वातावरण के महत्व को रेखांकित किया और नवाचार-आधारित विकास को गति देने में क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थानों की भूमिका पर प्रकाश डाला। नीति आयोग के प्रो. विवेक कुमार सिंह ने बैठक के बारे में जानकारी दी और नीति आयोग की अनुसंधान एवं विकास सुगमता पहल के मार्गदर्शक दृष्टिकोण के रूप में आरओपीई फ्रेमवर्क – बाधाओं को दूर करना, सक्षमताओं को बढ़ावा देना – पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि इस फ्रेमवर्क का उद्देश्य शोधकर्ताओं के सामने आने वाली संस्थागत और नीति-स्तरीय चुनौतियों को रेखांकित करना और साथ ही वैज्ञानिक प्रगति के लिए अनुकूल वातावरण बनाने हेतु आसान, अंतर-एजेंसी सहयोग और क्षमता विकास जैसे सहायक तकनीकी को बढ़ावा देना है।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव, डॉ. एम. रविचंद्रन ने अनुसंधान की दक्षता और प्रभाव को बढ़ाने के लिए ठोस सुझाव प्रस्तुत किए। उन्होंने सेवानिवृत्त वैज्ञानिक प्रतिभा के अनुभव का उपयोग करने, विश्वविद्यालय-उद्योग-सरकार इकोसिस्‍टम को सुदृढ़ करने, संस्थानों के बीच डेटा साझाकरण को बढ़ावा देना तथा वैज्ञानिक संचार को बेहतर बनाकर अनुसंधान के परिणामों को समाज के लिए अधिक प्रासंगिक और समझने योग्य बनाने पर बल दिया।

नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी.के. सारस्वत ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर डाला कि अनुसंधान एवं विकास में दो आसान महत्वपूर्ण तत्वों, आंतरिक और बाह्य कारकों पर निर्भर करती है। जहां आंतरिक कारक अनुसंधान संस्थानों की संरचना, प्रशासन और कार्यप्रणाली से संबंधित हैं, वहीं बाह्य कारक नियामक बाधाओं, वित्तपोषण तंत्र और विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्‍वय जैसे तत्‍वों को शामिल करते हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अनुसंधान और नवाचार में वैश्विक अग्रणी बनने के भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए दोनों आयामों पर एक साथ ध्यान देना जरूरी है।

इस बैठक में केरल के राज्यपाल श्री राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर भी उपस्थित थे, जिन्होंने अपने संबोधन में कहा कि ‘‘अनुसंधान एवं विकास में सुगमता’’ नागरिकों के जीवन को सुगम बनाने के व्यापक लक्ष्य से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जन-केंद्रित विकास के साथ जोड़ा जाना चाहिए, और संस्थानों, उद्योगों और सरकारों के बीच सहयोगात्मक दृष्टिकोण समावेशी विकास की कुंजी है। राज्यपाल ने कहा कि ‘‘राज्य के विकास से राष्ट्रीय विकास होगा’, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर आधारित नवाचार इकोसिस्‍टम की आवश्यकता पर बल मिलता है।

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