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झालमुड़ी बेचकर संवारी परिवार की जिंदगी, 47 साल से बराकर की रेल पटरियों पर गूंज रही राज कुमार की मेहनत की कहानी

बिहार से बंगाल आए थे आठ साल की उम्र में, झलमुड़ी की कमाई से दो बेटियों की शादी कर बनाई घर-गृहस्थी

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Tuesday, November 3, 2026

बराकर : जिंदगी में काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, बड़ा होता है इंसान का हौसला और अपनी मेहनत पर उसका विश्वास। बराकर के शारदा पल्ली में रहने वाले राज कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हाथों में झालमुड़ी का सामान, चेहरे पर मेहनत की लकीरें और दिल में परिवार के बेहतर भविष्य का सपना लेकर उन्होंने अपनी जिंदगी के करीब 47 साल रेल यात्रियों के बीच झलमुड़ी बेचते हुए गुजार दिए। आज उनकी कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मेहनत और ईमानदारी के दम पर अपनी दुनिया संवारने का सपना देखते हैं।

बिहार के बक्सर जिले के श्रीनगर इलाके से ताल्लुक रखने वाले राज कुमार महज आठ साल की उम्र में बंगाल आ गए थे। बचपन में ही जिंदगी की जिम्मेदारियों और संघर्षों से उनका सामना हो गया। वर्ष 1979 से उन्होंने झलमुड़ी बेचने का काम शुरू किया। उस समय शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि हाथों में झलमुड़ी की टोकरी लेकर शुरू हुआ यह सफर एक दिन उनके परिवार की खुशियों और भविष्य की मजबूत नींव बनेगा।

सुबह छह बजे शुरू होता था जिंदगी का सफर

राज कुमार की जिंदगी की घड़ी रेलगाड़ियों के समय के साथ चलती थी। बराकर रेलवे स्टेशन से सुबह करीब छह बजे कोलफील्ड एक्सप्रेस पकड़कर वे दुर्गापुर की ओर निकल जाते थे। वहां यात्रियों के बीच झलमुड़ी बेचकर दिनभर मेहनत करते और फिर ब्लैक डायमंड एक्सप्रेस अथवा सुपरफास्ट ट्रेन से लौटकर बराकर पहुंचते थे। ट्रेनों की आवाजाही, यात्रियों की भीड़ और लगातार भागदौड़ के बीच उनका हर दिन गुजरता था।

यह सिर्फ झलमुड़ी बेचने का काम नहीं था, बल्कि परिवार के सपनों को पूरा करने की एक लंबी लड़ाई थी। मौसम कैसा भी हो, दिन कितना भी थकाने वाला क्यों न हो, परिवार की जरूरतों ने उन्हें कभी रुकने नहीं दिया।

झालमुड़ी की कमाई से बेटियों की शादी, बनाया अपना घर

राज कुमार की मेहनत का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि उन्होंने अपनी छोटी-सी कमाई को परिवार की सबसे बड़ी पूंजी बना दिया। झालमुड़ी बेचकर जुटाई गई रकम से उन्होंने अपनी दोनों बेटियों की शादी की जिम्मेदारी निभाई। इतना ही नहीं, अपनी मेहनत की कमाई से बिहार में घर भी बनवाया।

जिस इंसान ने बचपन से संघर्ष को करीब से देखा, उसने अपनी मेहनत के सहारे परिवार को एक बेहतर जिंदगी देने की कोशिश की। उनके लिए हर दिन की कमाई सिर्फ पैसे नहीं थी, बल्कि बच्चों के भविष्य और परिवार की खुशियों की ओर बढ़ाया गया एक कदम था।

आज उनका एक बेटा पुणे में बीए की पढ़ाई करने के साथ काम भी कर रहा है। बेटे का पढ़ना और अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करना राज कुमार की वर्षों की मेहनत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

57 साल की उम्र में भी जारी है संघर्ष

आज करीब 57 वर्ष की उम्र में भी राज कुमार का मेहनत से रिश्ता कायम है। अब वे बराकर से बड़कखाना जाने वाली लोकल ट्रेन से मुगमा की ओर जाते हैं और वहां से हटिया पकड़कर लौटते हुए अपना काम जारी रखते हैं। समय बदला, रेलगाड़ियों के नाम और सफर के रास्ते बदले, लेकिन परिवार के लिए मेहनत करने का उनका जज्बा नहीं बदला।

करीब पांच दशक का यह सफर बताता है कि सफलता हमेशा बड़े कारोबार, ऊंची कुर्सी या मोटी कमाई से नहीं मापी जाती। कभी-कभी सफलता उस पिता के चेहरे पर दिखाई देती है, जिसने अपनी इच्छाओं को पीछे रखकर बच्चों का भविष्य बनाया, बेटियों को सम्मान के साथ विदा किया और अपनी मेहनत से परिवार के लिए घर खड़ा किया।

एक झलमुड़ी विक्रेता नहीं, मेहनत की मिसाल हैं राज कुमार

बराकर रेलवे स्टेशन और आसपास की रेलगाड़ियों में झलमुड़ी बेचने वाले राज कुमार जैसे लोग शहर की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। यात्री आते-जाते रहते हैं, ट्रेनें अपनी मंजिल की ओर बढ़ती रहती हैं, लेकिन इन सबके बीच ऐसे मेहनतकश लोग अपने परिवार के सपनों को लेकर लगातार सफर करते रहते हैं।

राज कुमार की कहानी उन अनगिनत मेहनतकश लोगों की कहानी है, जिनके संघर्ष की चर्चा शायद बड़े मंचों पर नहीं होती, लेकिन जिनकी मेहनत से घरों में चूल्हा जलता है, बच्चों की पढ़ाई चलती है और परिवार आगे बढ़ता है।

झलमुड़ी के हर पैकेट के पीछे उनकी मेहनत की एक कहानी है। बिहार से बंगाल तक का सफर, बचपन से जिम्मेदारियों का बोझ और करीब 47 वर्षों तक लगातार काम करने का जज्बा—राज कुमार की जिंदगी यही सिखाती है कि ईमानदारी से की गई मेहनत कभी छोटी नहीं होती। यही मेहनत किसी इंसान की सबसे बड़ी पहचान बन जाती है।

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