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कथा ग्राम : ” आस्था ” की डगर पर ” सियासी खेला”..!

बाजार के रूप में बदलती तस्वीर, स्थल पर श्रोताओं पर बरस रही समस्याओं की बरसात, मीडिया गैलरी में मीडिया के बंदों की जगह "असरदार" " काबिज "

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Saturday, January 17, 2026

Katha Gram: "Political game" on the path of "faith"..!

राजकुमार कुमार पाठक की कलम से
बांदा/
शहर क्षेत्र के अंदर मवई बाय पास के समीप बनाए गए “कथा ग्राम” में 5 दिन तक चलने वाले इस आस्था के महाकुंभ में दूसरे दिन शनिवार को जनता की धुंध इस कदर छाई कि “कथा बाजार” के साथ अव्यवस्थाओ का बोल बाले ने जनता जनार्दन को जगह जगह परेशानियों का जम कर सामना करना पड़ा। मीडिया गैलरी तक पहुंचने के लिए मीडिया जनों का गैलरी तक पहुंचाना तो दूर वहां फैले अव्यवस्थाओ का मंजर की तस्वीर ऐसी थी की वहां मीडिया के बंदों को एक भी कुर्सी नसीब नही थी उसपर तुर्रा ये कि कथा स्थल तक पहुंचने के रास्ते में कही तलाशी तो कही तो रास्ता ही बंद की बात बता सुरक्षा कर्मियों ने आगे न जाने देकर उन्हें वापस बैरंग आना पड़ा।

इसी दौरान कथा स्थल तक पहुंचने तक आम श्रद्धालुओ की बुरी दशा तब हो जाती जब उन्हें साधन बीच में छोड़ 2 से 3 किलोमीटर तक जब पैदल चलना पड़ रहा है। शहर के अंदर बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री की कथा के सफल आयोजन के लिए आयोजक संस्था द्वारा कई बार प्रेस वार्ता कराई गई जिसमे तरह तरह की जानकारियां देने के साथ जनता को निर्विघ्न कथा सुनाने के वादे किए गए थे। सोशल मीडिया से लगाकर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बाबा के आगमन से लगाकर कथा का प्रचार जम कर हुआ जिससे जनता जनार्दन हनुमंत कथा सुनने के लिए पहले दिन से ही उमड़ पड़ी लेकिन दूसरे दिन कथा श्रोताओं की भीड़ का सैलाब ऐसे उमड़ा जिसको नियंत्रित कर पाने में आयोजक संस्था के सेवादारों से लगाकर प्रशासन के हाथ पांव फूलते हुए नजर आए।

दूसरे दिन सभी पंडाल श्रद्धालुओ की भीड़ से ठसा ठस भरे नजर आए और इसके अलावा पब्लिक कथा ग्राम के मैदान में खड़े खड़े ही बाबा से कथा सुनने के लिए सर्दी की धूप में पसीने पसीने हो अपने कान लगाए रहे, लेकिन व्यवस्था पर आवाज को लेकर श्रोता सवाल भी उठाए रहे। पंडाल में बैठे लोगो के बताए अनुसार कानों में साफ आवाज भी नही आ रही । सबसे बड़ी दिक्कत उन वृद्ध श्रद्धालुओ की थी जिन्हे थोड़े थोड़े अंतराल में लघुशंका की शिकायत है, जो उनके लिए बहुत ही दुरूह समस्या बनी रही और एक समस्या का संकट उन महिलाओं के लिए सर का दर्द बन गया जो भूल या कहे मजबूरी बस अपने साथ छोटे छोटे बच्चो को लेकर कथा स्थल तक पहुंच गई और वहां की भीड़ देख बच्चे बेचैन हो रोने लगे और उनकी माताओं को उन्हें सम्हालना बावले जान जैसा बन गई।

अव्यावस्थाओ की तस्वीर और कथा स्थल को लेकर उठ रहे सवालिया सिलसिला यहीं नहीं समाप्त नही होता और कथा ग्राम और उसके इर्द गिर्द चल रहे बाजार को वहां मौजूद लोगों ने कथा बाजार की संज्ञा देते हुए यह कहने से यह परहेज नहीं किया कि यहां बिकने वाली सभी वस्तुएं खाद्य पदार्थ हो या धार्मिक सामाग्री सब ही महंगे दरो पर बेची जा रही है। कथा ग्राम के अंदर से लेकर बाहर तक बिकने वाली धार्मिक पूजन सामाग्री में क्या माला क्या नारियल और तो और सेंट और सिंदूर जैसी सामान्य सामग्रियां ” बाबा मोल ” में बेचे जा रहे है। इस हो रही जनता की ठगी से श्रद्धालुओ में निराशा और नाराजगी साफ खुले आम दिखाई और सुनाई दे रही है।

हालात इस कदर बदलते दिख रहे है कि यह कथा ग्राम कम बल्कि व्यवसाई आस्था का कथा बाजार साफ साफ दिखाई देता है अगर वहां मौजूद कथा श्रोताओं की जुबानी माने तो उनका यह भी कहना है कि कथा आयोजक इस कथा कार्यक्रम के नाम पर न केवल वो अप्रशिक्षित होने और अनुभवहीनता के मिशाल नजर आते है। कथा श्रोताओं का यहां तक कहना है कि आम आदमी को ढाल बना, श्रद्धा की आड़ में खुली सियासत का खेल खेला हो रहा है और अल्प समय में राजनितिक गलियारों में अपनी हनक संग जन पहचान बना चर्चा में बने रहने के साधन के तौर यह कथा कार्यक्रम आकां जा रहा है।

इस जन जुबानी का सच और झूठ राम जाने लेकिन चर्चाओ की माने तो कहने वाले यह भी कहते है कि ” जहां सुलगती ” है वहां ” धुआं भी उठता ” है। अभी कथा के 3 दिन शेष है आगे का नजारा तो अभी शेष है। देखते है आहे आगे होता है क्या..!..? फिल्हाल कुल मिलाकर आस्थावान लोगो की जुबाने कुछ यूं भी फिसल कर कहने में संकोच नहीं कर रही है कि ” कथा के समुद्र ” में ” गोते लगाने ” जैसी वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।

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