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अधूरा आधार, अधूरी नीति, नागरिक फँसा मकड़जाल में– रज्जू खान

नीतिगत अनिश्चितता के चलते आधार हो रहा अप्रासंगिक, सभी सरकारी योजनाओं में आधार की अनिवार्यता पर प्रश्नचिन्ह, जिस आधार से सरकार कर रही डीबीटी, वही निराधार हो रहा

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Saturday, November 29, 2025

Incomplete base, incomplete policy, citizens trapped in a web – Rajju Khan

रायबरेली ब्यूरो। सरकार द्वारा आधार कार्ड की उपयोगिता के संबंध में आए दिन विरोधाभासी फैसलों को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आफताब अहमद रज्जू खान एडवोकेट ने कहा कि आधार कार्ड जिसे भारत की सबसे बड़ी डिजिटल पहचान बताया गया आज हर सरकारी काम की पहली सीढ़ी बन चुका है। वोटर ID, PAN कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, बैंक खाता, स्कूल–कॉलेज में प्रवेश, छात्रवृत्ति, राशन कार्ड, सरकारी योजनाएँ कौन-सी सुविधा है जो आधार पर निर्भर नहीं ? एक दशक में यह कार्ड हमारी पहचान का सबसे अनिवार्य दस्तावेज़ बन गया है।

सरकार ने अरबों रुपये खर्च किए, जनता को लंबी-लंबी लाइनों में खड़ा कराया, आधार को मोबाइल, बैंक, राशन से जोड़ने के लाखों अभियान चलाए। लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि आधार ही भविष्य की कुंजी है, आधार ही लाभ का रास्ता है, और आधार ही पहचान की अंतिम सीढ़ी है लेकिन आश्चर्य यह है कि वही आधार जिसके बिना आज कोई योजना, कोई KYC और कोई सरकारी प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती फ़िर भी उसी आधार को सबसे बुनियादी पहचान जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। आधार को जन्म प्रमाणपत्र के बराबर दर्जा नहीं मिला है।

यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। यूपी सहित कई राज्यों में लाखों बच्चों का डेटा UDISE और विभिन्न शिक्षा पोर्टलों पर सिर्फ इसलिए अटक रहा है, क्योंकि आधार और जन्म प्रमाणपत्र की जन्मतिथि में मेल नहीं बैठता। छात्रवृत्तियाँ, DBT के लाभ, स्कूल रिकॉर्ड, सब कुछ आधार सत्यापन में अटक जाता है। अनेक परिवार केवल इसलिए लाभ से वंचित रह जाते हैं कि आधार के रिकॉर्ड में सुधार कराना आसान नहीं है तो गंभीर सवाल यह है कि यदि आधार जन्म प्रमाणपत्र का आधार नहीं, तो वह आखिर किस काम का है? सरकार ने जिस दस्तावेज़ को “सबसे अनिवार्य पहचान” बताया, वह क्या अब “निराधार” होता जा रहा है?
रज्जू खान ने कहा एक ओर सरकार लगभग हर सुविधा, लाभ और पहचान को आधार से जोड़ देती है, लेकिन दूसरी ओर यही आधार कई विभागों में अंतिम प्रमाण के रूप में मान्य ही नहीं।

यह विडंबना भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का सजीव उदाहरण है। नीति में असंगति, काग़ज़ों में टकराव, और बोझ नागरिक पर। लोग एक दशक से अधिक समय से आधार को बैंक, राशन, मोबाइल, पासपोर्ट, स्कूल रिकॉर्ड से जोड़ते-जोड़ते थक चुके हैं। दूसरी तरफ आधार में त्रुटियों का सुधार आज भी कठिन, धीमा और जटिल है। इस भारी-भरकम सिस्टम की कीमत नागरिक अपनी सुविधाएँ खोकर, लाभ रोककर, और फ़ॉर्मों में इधर-उधर दौड़कर चुका रहे हैं।

समस्या केवल तकनीकी नहीं है बल्कि यह नीतिगत अनिश्चितता का परिणाम है। यदि आधार को देश की सबसे बड़ी पहचान बनाना है, तो इसे पूर्ण, विश्वसनीय और एकरूप पहचान प्रमाण के रूप में मान्यता देनी होगी। जन्म प्रमाणपत्र, आधार, स्कूल रिकॉर्ड और सरकारी पोर्टलों के डेटा को एकीकृत किए बिना यह भ्रम और उलझन कभी खत्म नहीं होगी। अंततः, आधार ने पहचान को सरल बनाया जरूर है, लेकिन विरोधाभासों, अस्पष्ट नीतियों और कमजोर प्रक्रियाओं ने इसे पहचान के बजाय समस्या का केंद्र बना दिया है। जब तक सरकार इस मकड़जाल को सुलझाने के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समान नीति नहीं लाती, तब तक “आधार” नागरिकों के लिए सुविधा से अधिक परेशानी का कारण बना रहेगा।

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