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थोड़े प्रयास से ही मनुष्य राम जी जैसा हो सकता है — पूज्य प्रेमभूषण जी महाराज

“सुख-दुख में समभाव रखना ही सच्चा साधना मार्ग है, श्रीराम कथा ही कलियुग का अमृत है”

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Sunday, November 9, 2025

“जिस मनुष्य के मन में रामचरितमानस के माध्यम से भगवान श्रीराम के चरित्र का थोड़ा सा भी अंश आ जाए, वह राम जी के समान बन सकता है। यह कठिन नहीं, केवल निष्ठा और प्रयास की आवश्यकता है।” — यह प्रेरक वचन पूज्य प्रेमभूषण जी महाराज ने श्रीराम कथा के प्रथम दिवस पर कथा मंडप, कानपुर में व्यासपीठ से कथा वाचन करते हुए कहे।

अयोध्या टाइम्स सम्वाददाता। हरिओम द्विवेदी-कानपुर शनिवार महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य चाह कर भी किसी अन्य को खुश नहीं कर सकता, क्योंकि खुशी भीतर की अवस्था है। “भगवान राम और श्रीकृष्ण भी धरती पर अनेक कर्म करते हुए सभी को प्रसन्न नहीं कर पाए, तो फिर हम मनुष्य कैसे कर सकते हैं? हमें पहले यह समझना होगा कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है — विषय भोग नहीं, बल्कि ईश्वर की ओर गति करना।”

उन्होंने कहा कि कलियुग के पापों को काटने का एकमात्र सहज साधन श्रीराम कथा ही है। काम, क्रोध, लोभ, मद और मत्सर — ये सभी ‘कलिमल’ हैं, जिन्हें केवल रामकथा के श्रवण, गायन और मनन से ही धोया जा सकता है। “जो रामकथा को सुनता, कहता और गाता है, वह जीवन में सुख प्राप्त कर अंत में प्रभु श्रीराम के धाम को भी प्राप्त करता है,” पूज्य श्री ने कहा।

प्रेमभूषण जी महाराज ने कर्म और भाग्य का गूढ़ रहस्य स्पष्ट करते हुए कहा, “मनुष्य का मन और बुद्धि उसके कर्मों के अधीन हैं। जो सत्कर्म करता है, वही अपने प्रारब्ध को श्रेष्ठ बनाता है। अन्यथा बार-बार सोचने पर भी मनुष्य सत्पथ पर अग्रसर नहीं हो पाता।”

उन्होंने कहा कि जीवन में सुख और दुख दोनों का आना निश्चित है, परंतु दुख अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि दुख की घड़ी में ही मनुष्य भगवान के निकट आता है। “माता कुंती ने भगवान से दुख मांगे थे ताकि वे सदैव उनके समीप रहें। जब हम दुख में होते हैं, तब प्रभु की शरण में अधिक सहजता से पहुँचते हैं,” उन्होंने कहा।

महाराज श्री ने यह भी कहा कि अभ्यास से मनुष्य सुख और दुख दोनों ही अवस्थाओं में समभाव रख सकता है — यही संतों का लक्षण है। “संत किसी भी परिस्थिति में अपने मन की स्थिरता नहीं खोते, वही सच्चे साधक हैं,” उन्होंने श्रोताओं को समझाया।

कथा के अंत में पूज्य श्री ने कई भावपूर्ण भजनों का गायन किया। भजनों की मधुर लय पर उपस्थित रामभक्त झूम उठे और पूरा पंडाल “जय श्रीराम” के जयकारों से गूंज उठा।

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