राजकुमार पाठक/राजेंद्र शुक्ला
बांदा/जिले में तहसीलों का खेल भी अजीबों गरीब है। सदर तहसील का आलम कुछ ज़्यादा ही गया गुजरा हो कर सुर्खियां बटोर रहा है। सदर क्षेत्र का एक मामला की बानगी न केवल देखने लायक है बल्कि सवालों के घेरे में सुर्खियां बटोरने के साथ जांच और अन्वेषण की राह में खड़ी हो कर, आप बीती को लेकर इंसाफ की पुकार लगा रही है। मामला मौजा लड़का पुरवा स्थित गोड़ी बाबा रोड की एक जमीन का है।
फिल्हाल थोड़ी देर के लिए जिले की अन्य तहसीलों में जो है सो है लेकिन सदर तहसील में मची गदर की कहानी ही अपने आप में बोले तो बेमिसाल है।चर्चा है कि यहां गठजोड़ का कमाल है, एक जमीन के मामले में आरोप है कि गठजोड़ चला तो उसका तोड़ इंसाफ के लिए आहें भरकर राहें खोज रहा है। एक मामले में भूमाफियाओं के पक्ष में खुलकर खड़े होने की गठजोड़ की बानगी और क्या हो सकती है कि एक कास्तकार जिंदा रहते सारी अपनी ज़ायजाद बेच गया, इसके बावजूद उसके वारिसान तैयार किए गए, और वारिसानो से भी, भूमाफिया जमीनों की बिक्री कराता चला गया।अब यहां सवाल उठता है जब कास्तकार की जमीन बची ही नही थी, तो बिक्री किस चीज की होती रही..? बताते है कि असल कास्तकार की जमीन के सह खातेदार की जमीन मृतक बरातीलाल नामक कास्तकार के वारिसान बेचते चले गए और इंसाफ के लिए सह खातेदार पीड़िता दर दर भटकती रही और इंसाफ के नाम पर शहर में तैनात एक लेखपाल आख्या लगाने के नाम पर ” विजय ” की डंका बजाता रहा।पता चला है कि लेखपाल चार साल तक आख्या पे आख्या लगाता रहा, खबर है कि 19 बार अखयाएं लगाई, लेकिन उक्त जमीन की बिक्री बंद नही हुई।
सूत्रों की माने तो गाटा संख्या 4202 में 2641.94 वर्ग मीटर जमीन बाराती लाल के द्वारा बिक्रय किया गया जबकि उक्त गाटा में बाराती लाल 1/2 का हिस्सेदार था, उक्त गाटे का कुल रकबा 0.5430 हे0 था। इस प्रकार एक गणित के मुताबिक बराती लाल का हिस्सा लगभग 2710 वर्ग मीटर ही बन रहा था, धारक से बिक्री ज्यादा जमीन की कराई जाती रही। जानिए कि उक्त जमीन मौजा लड़ाका पुरवा स्थित गोड़ी बाबा रोड पर है, मिली जानकारी के मुताबिक हर गाटें पर 18 फूट का रास्ता भी इसी की जमीन से दिया गया है। कास्तकार बराती लाल की मौत के बाद वारिसानो के सहारे जमीन बिक्री का सिलसिला जारी रहा। इस तरह लगभग कुल 22 किता प्लाटो की बिक्री की खबर है।
अब सवाल उठता है कि कोई जानकार यह बता पायेगा कि शहरी लेखपालों के गठजोड़ के बिना ऐसे बैनामे कितने संभव है..?..! यहां यह बताना भी समीचीन होगा कि अपर आयुक्त के द्वारा सन 2021 में दिए गए फैसले की जांच तहसील प्रशासन करता रहा लेकिन झिंगुरी देवी का नाम खतौनी में दर्ज नहीं किया गया है। क्या यह खेल राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत के बिना खेला जा सकता है..?..! दूसरी तरफ झिंगुरी देवी भुक्त भोगी द्वारा लगभग 22 बार उच्चाधिकारियों से इस बात की यांचना की गई, कि माननीय अपर आयुक्त के फैसले का अनुपालन करा दिया जावे लेकिन अपर आयुक्त के फैसले को भी शहर के संबंधित लेखपाल ने उसको फुटबाल जैसा गेंद बना दिया और इसी गेंद को इधर उधर खेलते हुए लगभग चार साल तक खेलता रहा और तो और इस खेल में संबंधित तहसीलदार और एस डी एम को उलझाता कहें या फंसाता चला गया ।
क्या सच और क्या झूठ के आरोपों की बरस रही बरसात में इंसाफ जहां जांच और दोषियों की तलाश में दर दर भटक रहा है, वहीं दूसरी तरफ लेखपाल संघ का ही एक हिस्सा ऐसा भी है जो प्रशासन के सामने सवाल खड़ा करके पूंछता है आखिर शहर में छै – छै सालो से तैनात लेखपाल परिषदादेशो और शासनादेशो की धज्जियां उड़ा रहे है और ज़िम्मेदार अधिकारी आंख मूंद कर सहयोग कर रहे है। पिछले दिनों मंडलायुक्त और जिलाधिकारी ने लेखपाल संबद्धीकरण समाप्त करने के संबंधी आदेश भी किया था , जो कि अभी तक हवा में उड़ धरातल से दूर है। इस तस्वीर को देखकर डंके की चोट पर यदि यह कहा जावे कि बांदा के भूमाफियाओं से राजस्व अधिकारियों, कर्मचारियों का गठजोड़ है तो शायद झूठ नही होगा। इसी वजह से कई ऐसे लेखपाल और अन्य कुछ ऐसे कर्मचारी है जो करोड़ों की बेनामी संपत्ति के मालिक बन बैठे है। उधर इंसाफ खामोशी की स्याह चादर ताने खड़ा है।अब देखना है इंसाफ के लिए कोई कदम आगे आता है या यही दम चलता रहेगा।







