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स्वार्थ की अंधी दौड़ में खोता मानव : समाज को जागने की ज़रूरत

हरिओम द्विवेदी, पत्रकार आज का समाज जिस मोड़ पर खड़ा है, उसे देखकर सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है — क्या मनुष्य वास्तव में मनुष्य ही रह गया है? जिस मानवता पर हम गर्व करते थे, आज वही मानवता स्वार्थ की धूल में दबती जा रही है।

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Sunday, November 16, 2025

Mankind is lost in the blind race of selfishness: Society needs to wake up

हरिओम द्विवेदी, पत्रकार

 आज का समाज जिस मोड़ पर खड़ा है, उसे देखकर सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है — क्या मनुष्य वास्तव में मनुष्य ही रह गया है? जिस मानवता पर हम गर्व करते थे, आज वही मानवता स्वार्थ की धूल में दबती जा रही है। न जाति की मर्यादा बची, न पद की प्रतिष्ठा, न धर्म की संवेदना और न ही मनुष्य होने का मूल धर्म। सब कुछ एक ही शब्द के आगे बौना पड़ गया है — स्वार्थ।

आज मनुष्य मनुष्य को गुमराह कर रहा है। रिश्तों में छल घुल चुका है, समाज में अविश्वास बढ़ चुका है, और व्यक्ति अपनी सुविधा के लिए दूसरों के भविष्य तक से खेल रहा है। किसी को नीचे गिराकर स्वयं ऊपर चढ़ने की प्रवृत्ति आज सामान्य होती जा रही है। दुखद यह है कि इस प्रवृत्ति को कोई अपराध नहीं मानता, बल्कि बुद्धिमानी समझकर गर्व से बताता है।

धर्म का अर्थ अब प्रतिदिन बदल रहा है। सत्य और करुणा की जगह दिखावा और लाभ ने ले ली है। धर्म कभी मानवता को जोड़ने के लिए था, आज वही धर्म स्वार्थ और राजनीति का साधन बनता जा रहा है। समाज में मतभेद और विघटन को बढ़ाने वाला रूप कभी भी धर्म का स्वरूप नहीं था — यह तो मनुष्य के भीतर की लालसा का प्रतिबिंब है।

जाति और पद की मर्यादा भी स्वार्थ के आगे टिक नहीं पाती। जो पद सेवा के लिए मिला था, वह शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गया है। संवेदना और कर्तव्य को पीछे छोड़कर केवल अपना लाभ देखने की प्रवृत्ति समाज को धीरे-धीरे खोखला कर रही है।

मानवता आज सबसे अधिक संकट में है। कभी किसी के दुःख में साथ देने वाला समाज, आज किसी के गिरने पर तालियां बजाने लगा है। लोग मदद करने से पहले सौ बार सोचते हैं, लेकिन आलोचना और निंदा करने में एक पल नहीं लगाते।

स्वार्थ की इस अंधी दौड़ का परिणाम बहुत भयावह हो सकता है। यदि मनुष्य मनुष्य का साथ छोड़ देगा, तो फिर यह समाज किस दिशा में जाएगा?

आवश्यक है कि हम स्वयं से प्रश्न करें— क्या हम वही समाज बनाना चाहते हैं जहाँ लाभ बड़ा और मनुष्य छोटा हो जाए? क्या हम वह पीढ़ी बनना चाहते हैं जो मानवता को पीछे छोड़कर स्वार्थ को ही धर्म मान ले?

समय है कि हम जागें।
समय है कि मनुष्य फिर मनुष्य बने।
समय है कि मानवता, करुणा, और सत्य को फिर से अपने जीवन में स्थापित करें।

यदि समाज को बचाना है, तो स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता है। क्योंकि मनुष्य वही है जो दूसरों का मार्ग भी रोशन करे, न कि गुमराह।

  • स्वार्थ के धुएँ में धुँधला हुआ हर इंसान है,
    मनुष्यता खोकर क्यों इतना गुमान है?
    जाग उठो अब, इंसानियत को फिर से जगाना है,
    टूटते रिश्तों के बीच प्रेम का दीप जलाना है।

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