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महिलाओं में भी तेजी से घर करता अवसाद

महिलाओं में अवसाद से निपटने के लिए केवल चिकित्सकीय इलाज ही पर्याप्त नहीं है

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Thursday, September 4, 2025

– महिलाओं में अवसाद से निपटने के लिए केवल चिकित्सकीय इलाज ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज, परिवार और सरकार को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां महिलाएं बिना डर और संकोच के अपने मानसिक स्वास्थ्य की बात कर सकें। इससे वे अधिक आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और स्वस्थ जीवन जी पाएंगी।

लेखिकाहाल ही में उत्तर प्रदेश में एक दिल को छूने वाली घटना घटी, जब मानसिक अवसाद से ग्रस्त रानी देवी 17 साल बाद अपने परिवार से मिलीं। रानी देवी की यह घटना समाज के लिए एक बड़ी सीख है। उत्तर प्रदेश के झांसी की रहने वाली रानी देवी का जीवन 17 साल पहले अचानक बदल गया था। वर्ष 2008 में वह घर से अचानक लापता हो गईं। परिवार ने हर जगह तलाश की, पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई और अखबारों में गुमशुदगी का विज्ञापन छपवाया, लेकिन रानी देवी का कोई सुराग नहीं मिला। धीरे-धीरे परिवार को यह यकीन हो गया कि वह शायद कभी लौटकर नहीं आएंगी।
     असल में रानी देवी गंभीर मानसिक अवसाद से जूझ रही थीं। घरेलू दबाव, आर्थिक तंगी और पारिवारिक उपेक्षा ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था। इसी मानसिक स्थिति में उन्होंने घर छोड़ दिया और अजनबी शहरों में भटकती रहीं। कई सालों तक उन्होंने आश्रमों और पुनर्वास केंद्रों में जीवन बिताया। इस दौरान उनका परिवार और समाज से संपर्क पूरी तरह टूट गया। साल 2025 में एक पुनर्वास केंद्र में समाजसेवियों की नजर उन पर पड़ी। आधार कार्ड और स्थानीय पुलिस की मदद से उनकी पहचान की गई। खबर मिलते ही परिवार को विश्वास नहीं हुआ कि 17 साल से बिछड़ी रानी देवी सचमुच मिल गई हैं।
     अब बात करते हैं मूल समस्या की। असल में देश में महिलाओं का मानसिक अवसाद केवल स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक बहुआयामी सामाजिक समस्या है। भारत जैसे देश में जहां पारंपरिक सोच और आधुनिक जीवनशैली आपस में टकराती हैं, वहां महिलाएं दोहरी चुनौतियों से गुजरती हैं। एक ओर उनसे पारंपरिक भूमिकाएं निभाने की अपेक्षा की जाती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक प्रतिस्पर्धी समाज में बराबरी साबित करने का दबाव उन पर होता है। यह द्वंद्व की स्थिति उनके मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करती है। महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य की समस्या एक गंभीर सामाजिक मुद्दा भी है। पारंपरिक समाज में अक्सर महिलाओं की भावनाओं और उनके मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिसके कारण वे अवसाद, चिंता और तनाव जैसी बीमारियों का सामना करती हैं।
     अब बात करते हैं रानी की तरह अवसाद से जूझ रही महिलाओं की। हाल के शोध बताते हैं कि भारत में अवसाद से पीड़ित कुल मरीजों में लगभग आधी संख्या महिलाओं की है। विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि प्राथमिक देखभाल स्तर पर महिलाओं में अवसाद की व्यापकता औसत 41 प्रतिशत है, जो सामाजिक और आर्थिक दबाव, घरेलू हिंसा और शिक्षा की कमी जैसी वजहों से और बढ़ जाती है। शहरी अनौपचारिक बस्तियों में किए गए शोध में 15 प्रतिशत महिलाओं ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी हल्के, 9 प्रतिशत ने मध्यम और 6 प्रतिशत ने गंभीर अवसाद या चिंता के लक्षण दर्ज किए। वृद्ध महिलाओं में स्थिति और गंभीर होती है; 50 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में अवसाद की दर 21.7 प्रतिशत पाई गई, जबकि 60 वर्ष से अधिक आयु में यह दर 9.5 प्रतिशत थी, जो पुरुषों की तुलना में अधिक है।
     मानसिक स्वास्थ्य की कमी और अवसाद का परिणाम आत्महत्या की घटनाओं में भी दिखाई देता है। एनसीआरबी के अनुसार, 2021 में भारत में 164,033 आत्महत्याएं हुईं, जिनमें 48,172 महिलाएं शामिल थीं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि परिवार, समाज और स्वास्थ्य संस्थाओं की मदद के बिना महिलाएं अवसाद के प्रभाव से उबरने में सक्षम नहीं हो पातीं। 2025 के हालिया आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में अनुमानित रूप से लगभग 41.9 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी रूप में अवसाद का सामना कर रही हैं। प्रजनन आयु की महिलाओं में मानसिक संकट की दर और भी अधिक पाई गई है। दिल्ली के निम्न-से-मध्यम आय वाले क्षेत्रों में 54.3 प्रतिशत महिलाओं ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों का अनुभव किया, जिनमें 20 प्रतिशत ने गंभीर अवसाद के लक्षण महसूस किए। प्रसवोत्तर महिलाओं में भी 19-23 प्रतिशत की दर से अवसाद की घटनाएं दर्ज की गई हैं।
     ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से बताने का अवसर नहीं मिलता। वहीं शहरी महिलाएं नौकरी, परिवार और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में मानसिक दबाव झेलती हैं। ग्रामीण भारत में मानसिक अवसाद से ग्रस्त महिलाओं की स्थिति और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि वे समय पर सही इलाज तक नहीं पहुंच पातीं। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, अशिक्षा, गरीबी और समाज में मानसिक रोगों को लेकर व्याप्त अंधविश्वास इसके मुख्य कारण हैं।
     अक्सर देखा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जब कोई महिला अवसाद या मानसिक तनाव से जूझती है, तो परिवार और गांव के लोग इसे भूत-प्रेत या जादू-टोना का परिणाम मान लेते हैं। ऐसी परिस्थितियों में महिलाएं डॉक्टर या काउंसलर की बजाय ओझा, तांत्रिक या झाड़-फूंक करने वालों के पास ले जाई जाती हैं। वहां उन्हें झाड़ा-फूंका और टोटके कराए जाते हैं, जिससे असली बीमारी का इलाज नहीं हो पाता। कई बार यह अंधविश्वास महिलाओं की स्थिति को और बिगाड़ देता है और समय पर इलाज न मिलने से वे गंभीर अवसाद या अन्य मानसिक रोगों का शिकार हो जाती हैं। कई मामलों में उनकी मौत तक हो जाती है। वहीं परिवार भी इसे शर्म या बदनामी का विषय मानता है।
     वहीं शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति तेजी से चिंता का विषय बन रही है। महानगरों और बड़े शहरों में रहने वाली महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां हैं नौकरी और परिवार का संतुलन, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, एकाकीपन, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, देर रात तक काम करने की मजबूरी, नींद की कमी और रिश्तों में असुरक्षा भी अवसाद को गहराता है। 2025 की हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत के शहरी क्षेत्रों में लगभग 25–30 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी स्तर पर अवसाद से ग्रसित हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा 20 से 40 वर्ष की उम्र के बीच की महिलाओं का है।
     अब बात करते हैं समाज की। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में अब भी झिझक और कलंक की भावना मौजूद है, जिसके चलते महिलाएं समय पर इलाज नहीं ले पातीं। महिलाओं में अवसाद की समस्या का समाधान केवल दवाओं या काउंसलिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। ग्रामीण महिलाओं के संदर्भ में देखा जाए तो वहां मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता का स्तर अभी भी बहुत कम है। अधिकतर महिलाएं अवसाद को बीमारी मानने के बजाय झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास की शरण लेती हैं।
     इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए गांवों में स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन, महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से परामर्श और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मानसिक स्वास्थ्य की शिक्षा देना आवश्यक है। इसके अलावा मोबाइल हेल्थ वैन और टेलीमेडिसिन सेवाएं ग्रामीण महिलाओं के लिए लाभकारी हो सकती हैं। शहरी महिलाओं की स्थिति अलग है। वे अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित और जागरूक होती हैं, लेकिन कॅरियर, परिवार और सामाजिक दबाव के बीच संतुलन बनाते-बनाते मानसिक रूप से थक जाती हैं। उनके लिए कार्यस्थलों पर मानसिक स्वास्थ्य अवकाश, ऑनलाइन काउंसलिंग और कर्मचारी सहायता कार्यक्रम बहुत प्रभावी हो सकते हैं। इसके साथ ही परिवार को भी यह समझने की आवश्यकता है कि महिला की भावनात्मक जरूरतें भी पुरुषों जितनी ही महत्वपूर्ण हैं।
     वहीं महिलाओं में अवसाद का एक और बड़ा कारण प्रसवोत्तर अवसाद है। इसके समाधान के लिए अस्पतालों और क्लीनिकों में प्रसवोत्तर परामर्श और मां सहायता समूह की व्यवस्था करनी चाहिए। योग, ध्यान, प्राणायाम और नियमित व्यायाम महिलाओं की मानसिक स्थिति को काफी हद तक संतुलित कर सकते हैं। सरकारी स्तर पर भी कई कदम उठाए जा रहे हैं जैसे टेली-मानस हेल्पलाइन, मानसिक स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती पर विशेष योजनाएं और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम। अवसाद से निपटने के लिए केवल चिकित्सकीय इलाज ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज, परिवार और सरकार को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां महिलाएं बिना डर और संकोच के अपने मानसिक स्वास्थ्य की बात कर सकें। इससे वे अधिक आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और स्वस्थ जीवन जी पाएंगी। हम सभी को मिलकर महिलाओं के लिए स्वस्थ माहौल का निर्माण करना होगा, तभी देश और समाज आगे बढ़ पाएंगे।

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