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(बरेली में सौहार्द की मिसाल)

जोगीनवादा में मुस्लिमों ने कावड़ियों पर बरसाए फूल -हिंदुओं ने मोहर्रम में किया था स्वागत( दैनिक अयोध्या टाइम्स)बरेली। कभी दंगों और कर्फ्यू के लिए चर्चित रहा बरेली का जोगीनवादा अब भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की नई पहचान बन रहा है। सावन के पहले शुक्रवार को जब कावड़

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Friday, July 11, 2025

जोगीनवादा में मुस्लिमों ने कावड़ियों पर बरसाए फूल

-हिंदुओं ने मोहर्रम में किया था स्वागत
( दैनिक अयोध्या टाइम्स)
बरेली। कभी दंगों और कर्फ्यू के लिए चर्चित रहा बरेली का जोगीनवादा अब भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की नई पहचान बन रहा है। सावन के पहले शुक्रवार को जब कावड़ यात्रा नूरी मस्जिद के सामने से गुज़री, तो मुस्लिम समुदाय ने शिवभक्तों पर फूलों की वर्षा कर उनका स्वागत किया। इससे पहले मोहर्रम में हिंदू समाज ने ताजिए पर फूल बरसाकर इसी सद्भाव का परिचय दिया था।
इस सौहार्दपूर्ण माहौल के पीछे जनता की बदलती सोच के साथ-साथ थाना बारादरी की पुलिस टीम, विशेषकर प्रभारी धनंजय पांडेय की सतत मेहनत और संवाद नीति का भी अहम योगदान है। बीते एक महीने से क्षेत्र में लगातार शांति समितियों की बैठकें, जनसंवाद और निगरानी से स्थिति को पूरी तरह नियंत्रण में रखा गया।
2010 की हिंसा से 2025 की मोहब्बत तक-
2010 की सांप्रदायिक हिंसा और एक महीने तक चले कर्फ्यू की भयावह यादें आज भी लोगों के मन में हैं। लेकिन आज बरेली का वही जोगीनवादा “मोहब्बत का मोहल्ला” बन चुका है। इस बार कावड़ यात्रा में मुस्लिम युवाओं ने स्वागत-सजावट से लेकर सेवा कार्यों में भी भाग लिया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय और सौहार्दपूर्ण रहा।
पुलिस-प्रशासन की रणनीति: सख्ती और संवाद का संतुलन-
इस बदलाव का श्रेय जनता के साथ-साथ एसएसपी अनुराग आर्य और डीएम अविनाश सिंह की रणनीतिक पहल को भी जाता है। हर थाना क्षेत्र में शांति समितियों की सक्रिय बैठकों से तनाव की आशंका पहले ही दूर कर दी गई। सीओ थर्ड पंकज श्रीवास्तव और थाना प्रभारी धनंजय पांडेय ने लगातार क्षेत्र में भ्रमण कर व्यक्तिगत संवाद से माहौल सौम्य बनाए रखा।
सीसीटीवी , सोशल मीडिया मॉनिटरिंग, पैदल गश्त और त्वरित प्रतिक्रिया दल की तैनाती से संभावित उपद्रवियों को पूरी तरह रोक दिया गया।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की वापसी-
जोगीनवादा अब टकराव नहीं, मिलन की ज़मीन बन गया है। ताजिए और कावड़ के बीच अब दीवारें नहीं, रिश्ते हैं। अब शिवभक्त भी ताजिए की इज्ज़त करते हैं और हुसैनी अनुयायी भी कावड़ियों को फूल बरसाकर रुखसत करते हैं।

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