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” चकबंदी या ‘चक्रव्यूह’..! ” न्याय की कुर्सी पर ‘लाठी’ का पहरा “

भ्रष्टाचार और बदसलूकी के आरोपों से घिरा एस ओ सी दफ्तर, कारनामों की कई झांकियां आई प्रकाश में

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Friday, February 6, 2026

"Consolidation of land or 'Chakravyuh'..! "The seat of justice is guarded by a 'stick'"

राजकुमार पाठक

बांदा/एक साहित्यकार की यह पंक्ति कि ” कानून किताबो में कैद है और अपराध सत्ता की गोद में पलता है। ” फिल्हाल यह लाइन बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी की कार्य संस्कृति की ओर इशारा करती है। चर्चा है कि इनके न्याय का पैमाना, जब केवल लंबे लेनदेन से ही नहीं चलता, तब ये लाठी डंडों का भी सहारा लेते है। जोर से शोर है कि लाठी डंडों का सहारा किसी वादकारी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने मातहत कर्मचारी के खिलाफ अपने कक्ष में वकीलों की मौजूदगी में कहते है कि दरवाजा बंद करो और मेरा डंडा उठाओ तब यह मानेगा, जुबान से नहीं मानेगा। बदलते हालातो के चलते मामला न्यायालय तक जाता है और संबंधित माननीय न्यायालय 156/3 के मामले में जिलाधिकारी से विस्तरित रिपोर्ट मांगती है। कदाचार के मामले को लेकर, चर्चा इन दिनों गर्म है।

जिले में चकबंदी के अधिकारी से लगा कर कार्यकर्ताओं पर आरोपों सहित टीका टिप्पणियों का दौर न केवल चर्चा में है बल्कि अभी तक उच्चाधिकारियों तक पहुंची कई शिकायतो का लंबा जखीरा प्रदेश की राजधानी तक पहुंच कर आप बीती कथा व्यथा के इजहार का सिलसिला लगातार जारी है। अभी तक कई कर्मचारी कार्यवाहियों के घेरे में रहते हुए अपनी कार्यगुजारियो का दंड पाए है और कुछ कार्यवाहियों के घेरे के फेरे में फंसे अपनी बचत का रास्ता अख्तियार कर अपनी करगुजारियो से दबाए बैठे है। फिर एक बार यहां तैनात बंदोबस्त अधिकारी कुर्सी पर बैठ कर, जब लाठी डंडों की बात करते है तब यहां के विद्वान अधिवक्ता कहते है कि क्या लाठी डंडों की बात करना अपराधिक क्रत की श्रेणी में नहीं आता है..!..? कुछ विद्वान अधिवक्ताओ ने चकबंदी अधिकारी की इस कार्य संस्कृति का कड़ा प्रतिरोध दर्ज कराते हुए बार एसोसिएशन को पत्र भी लिखकर अवगत कराया है, जिसपर इनकी अदालत का बहिष्कार भी लगभग 15 दिनों तक चला, लेकिन कुछ बदलेगा जैसे भाव को लेकर बहिस्कार वापस ले लिया गया। कहते है कि अपने ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जिनका नाम लल्लू बताया जाता है, उसको हाथ पैर तोड़ने की धमकी, जो कक्ष में लगे सी सी टी वी में कैद थी इसी को आधार बना कर उक्त कर्मचारी ने उच्चपदस्थ अधिकारियो से शिकायत की और इंसाफ के लिए मा0 न्यायालय तक जाने का रास्ता भी अख्तियार किया।

सी आर पी सी की धारा 156/3 के तहत दर्ज मामले की पैरवी फौजदारी के अधिवक्ता संतोष सिंह कर रहे है।इधर चकबंदी अधिकारी ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को निलंबित कर दिया, अपने निलंबन के खिलाफ उक्त कर्मचारी जब हाई कोर्ट प्रयागराज पहुंचा तो उच्च न्यायालय ने निलंबन पर रोक लगा दी। इधर कर्मचारी ड्यूटी पर तो है लेकिन दहशतजदा है वहीं दूसरी ओर बदलते हालातो को मद्दे नजर रखते हुए मिली जानकारी की माने तो कुछ बचाव के रास्ते भी अख्तियार किए है।

मामला आगे की क्या तस्वीर बनाता है यह तो आने वाले समय में पता चलेगा लेकिन फिलहाल सूत्री के हवाले से पता यह चला है कि प्रकरण की जांच का जिम्मा डी डी सी/ ए डी एम को सौंपा गया है, अब देखने वाली बात यह होगी कि जांच में आगे क्या निकलता है और कौन सच्चा और कौन झूठा निकलता है..!..? लेकिन इनकी कार्य संस्कृति की ओर जो नजरे इनायत है उनको लेकर चर्चाओ और जुबानों के शोर को यदि सच माने तो, चकबंदी के कुछ कारनामे जो प्रकाश में आकर शोर का रूप अख्तियार कर रहे है, उनमें पैलानी सर्किल के मड़ौली कलां गांव के निवासी चुन्नू को, सहायक चकबंदी अधिकारी पैलानी ने 0.166 हेक्ट0 भूमि का चक बनाया था, भौगोलिक स्थिति खराब होने की वजह से असंतुष्ट चुन्नू अपीलीय अदालत एस ओ सी बांदा के यहां आया तो पता नहीं क्या हो गया, कि निचले स्तर से विभागीय कर्मचारियों द्वारा भेजी गई संशोधन तालिका को नजर अंदाज कर ,अपील खारिज कर दी, मामला यहीं नहीं समाप्त होता।

चिल्ला पदारथपुर के एक मामले में जहां पर एक जमीन है पक्षकार भी एक है, विनय नामक पक्षकार जब सी ओ चकबंदी के फैसले से क्षुब्ध होकर अपील में एस ओ सी के यहां आया तो, यहां विनय बनाम चंद्रिका की जगह दो और कास्तकार जोड़े जाने की खबर सुर्खियां बटोर रही है। एक और मिली जानकारी को यदि मान लिया जाए तो एक प्रार्थना पत्र आया जिसमे पक्षकार मान लेने की बात कही गई, लेकिन यहां का नजारा कुछ ऐसा बदला कि कार्य संस्कृति और कारनामें पर एक बार फिर वकीलों का गुस्सा फूट पड़ा अंततः प्रार्थना पत्र को पत्रवाली में रखने का आदेश बामुस्किल किया गया। अब पता चला है कि इस मामले की ट्रांसफर एप्लिकेशन चकबंदी आयुक्त लखनऊ के यहां विचाराधीन है।

एक अन्य प्रकरण भी प्रकाश में आया है जो जसपुरा का बताया जाता है, कास्तकार बलदेव ने अपनी प्रस्तावित भूमि का एक बैनामा किया चूंकि दौरान चकबंदी किए गए बैनामे का नामांतरण ए सी ओ पैलानी ने किया था, पता चला हर कि परिणाम स्वरूप क्रेता मुन्नी देवी को क्रय की गई भूमि की हिस्सा मिल चुका था, परंतु बंदोबस्त अधिकारी ने 20 जनवरी 2026 को ऐसा आदेश सुनाया जिसमे क्रय की गई भूमिं के अलावा 2 नंबर और क्रेता के हक में चले गए, हालांकि नामांतरण करने वाला साहिब ए सी ओ इस कृत्य के चलते निलंबन का दंड भोगना पड़ा और तो और कार्यवाही का तीर जब आगे बढ़ा तो बर्खास्तगी भी झेलनी पड़ी, उसी आदेश को यथावत रखने का फैसला देने वाले एस ओ सी पर कोई कार्यवाही होगी यह सवाल राजस्व के जानकर कुछ विद्वान अधिवक्ताओ का है..?..! फिल्हाल अधिवक्ताओ से लगाकर अन्य कई कातर नजरे अगली कार्यवाही की बाट जोहती नजर आ रही है और चकबंदी के नाम पर मची भर्रा शाही पर रोकथाम के इंतजार में है।

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