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“हम भारत के लोग” संविधान की प्रस्तावना आदर्श वाक्यांश

गणतंत्र दिवस भारत देश के राष्ट्रीय महत्व का पर्व है। इस पर्व को भारत की पूर्ण आजादी का पर्व माना जाता है। गणतंत्र दिवस की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है, की इस दिन भारत ने अपना संविधान लागू किया था।भारत का लिखित संविधान जिसे भारत की

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Saturday, January 24, 2026

"We the people of India" Preamble to the Constitution is the motto

गणतंत्र दिवस भारत देश के राष्ट्रीय महत्व का पर्व है। इस पर्व को भारत की पूर्ण आजादी का पर्व माना जाता है। गणतंत्र दिवस की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है, की इस दिन भारत ने अपना संविधान लागू किया था।भारत का लिखित संविधान जिसे भारत की जनता ने अंगिकृत, अधिनियमित एवं आत्मार्पित किया था। भारत के संविधान की प्रस्तावना का पहला वाक्यांश “हम भारत के लोग” भारत के संविधान की शक्ति और संप्रभूता का स्त्रोत यदि कोई है तो वह है, भारत के नागरिक है। नागरिक समाज ही भारत का असली निर्माणकर्ता है।

संविधान में वर्णित “हम भारत के लोग” भारत के करोडो नागरिको की सामूहिक चेतना है। भारत के संविधान की प्रस्तावना का यूँ तो एक-एक वाक्य अथाह और गहरे अर्थ लिए हुए है। भारत राष्ट्र के संविधान की प्रस्तावना को अनेको विद्वानों ने संविधान की कुंजी या सार, राजनैतिक कुंडली एवं परिचय-पत्र भी बताया है। विद्वान के एम मुंशी ने प्रस्तावना को भारतीय संविधान की राजनैतिक कुंडली बताया, पंडित ठाकुर दास भार्गव ने संविधान की आत्मा तो ब्रिटिश राजनितिक वैज्ञानिक सर अर्नेस्ट बार्कर ने प्रस्तावना को संविधान के मूल सिद्धांतो और दर्शन का निचोड़ माना है।

कुल मिलाकर भारतीय राष्ट्र के संविधान का आरम्भ जिस प्रस्तावना से होता है। उस प्रस्तावना का शब्द-शब्द गौरव की अनुभूति कराता है। भारतीय संविधान में उल्लेखित प्रस्तावना के यह सुंदर शब्द देखिये हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी, पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रतात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को – सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 को एतत द्वारा इस संविधान को अंगिकृत, अधिनियमित, और आत्मार्पित करते है।

दरअसल प्रस्तावना में उल्लेखित पदावली हम भारत के लोग ही भारत की असली ताकत है। भारत के नागरिक ही भारत के असली निर्माता है। जनता ही संविधान का स्त्रोत है। भारतीय जनता ने ही अपनी संप्रभु इच्छा को इस संविधान के माध्यम से व्यक्त किया है। भारत की जनता की सामूहिक चेतना ने ही अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने और स्वतंत्रता प्राप्ति में अहम भूमिका निभाई है। अब जबकि भारत एक गणराज्य के रुप में अपना 77वा गणतंत्र दिवस बना रहा हो, तब यह सोचना लाजमी है की प्रस्तावना का मुख्य स्त्रोत भारत का नागरिक कहाँ खड़ा है।

जमीन पर काम कर रहा सिस्टम नागरिक समाज के अधिकारों की रक्षा करने में कितना कारगर साबित हुआ है? देश का आमआदमी ही वह लक्ष्य है, जिसकी बेहतरी और खुशहाली के लिए देश की संसद, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका कार्यरत है, किंतु देखा जाता है की संविधान में बेहद ताकतवर और मजबूत दिखाई देने वाला यह आमनागरिक व्यवस्थाजनित दोषों के कारण उन बुनियादी सुविधाओं से वँचित है जिसका उसे संविधानिक अधिकार प्राप्त है।

हम देखते है की सरकार और उसके नुमाइंदे जिनका काम नागरिक सुरक्षा के कामो को अंजाम देना होता है निजी हितो के कारण कुछ खास लोगो के हाथ की कठपुतली बन जाते है। भारत देश के प्रत्येक नागरिक को पानी, बिजली, आवास, सड़क, शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना शासन तंत्र का दायित्व है, किंतु व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्ट्राचार ने आम आदमी के हक की सुविधाओं पर डाका ड़ालते हुए इसे दूर और देरी का कारण बना दिया है।

आमआदमी को पेयजल की उपलब्धता के लिए केंद्र सरकार जल जीवन मिशन के तहत हर घर नल से जल योजना को 2024 तक अंजाम तक पहुंचना बता रही है, किंतु इस योजना की सच्चाई का दृश्य बड़वानी जिले के ग्रामीण अंचलो में देखने पर ज्ञात होता है की कहीं टंकी अब तक नही बनी, कहीं टंकी निर्माण में अनियमितता साफ दिखाई देती है तो अनेकों ग्राम में पाइप लाइन डालने में कोताही बरती जा रही है। नल से शुद्ध जल प्रदाय की यह व्यवस्था कागजी अधिक दिखाई देती है।

जब इंदौर जैसे शहर के भागीरथपूरा इलाके में जहां जहरीला पानी पिने से 25 नागरिक दम तोड़ देते हो, जिम्मेदार नगरीय प्रशासन मंत्री इसे फोकट का सवाल और घंटा जैसे शब्दों के इस्तेमाल से अपने दायित्व से बचना चाह रहे हो, तब नागरिक समाज के लिए कार्यरत सिस्टम और जन प्रतिनिधी दोनों लापरवाह और गैर जिम्मेदार नजर आते है। सरकारी शिक्षा और प्रायवेट शिक्षा ने समाज को दो भागों में विभाजित कर दिया है। सरकारी और प्रायवेट शिक्षा का यह अंतर नागरिक समाज की बैचैनी का कारण है। यहीं हाल नागरिक चिकित्सा का दिखाई देता है। बड़े शहरों में महंगे अस्पतालो में आमजन की पहुंच ही नही है। आमजन गाँव या तहसील मुख्यालय के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के भरोसे है जहां डॉक्टर और सुविधा दोनों कम है।

आयुष्मान भारत योजना के तहत जरूर गरीब वर्ग को 5 लाख रु तक के इलाज की सुविधा दी गयी है। इस योजना में सभी वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए। इसके ईमानदार क्रियान्वयन की भी आवश्यकता है। आवास से वँचित लोगो के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना अंतर्गत मकानों का निर्माण हुआ है किंतु अभी बहुत कुछ करना बाकी है इस योजना को जमीन पर सरलता से उतारे जाने की आवश्यकता है। ग्रामीण भारत में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना अंतर्गत बन रही सड़को में जारी अनियमितता इस महत्वपूर्ण योजना के उद्देश्य और लक्ष्य को कमजोर कर रही है।

उजाला हर भारत वासी के घर तक पहुंचना चाहिए किंतु इसकी रफ्तार धीमी है। शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा गाँवो में परिवहन के साधनों का अभाव है। परिवहन विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित यात्री बसों एवं वाहनो के संचालन में अनदेखी करता है। बिना बीमा, परमिट के संचालित वाहन बेखौप संचालित होते है जो ग्रामीण नागरिकों की जान पर खेल कर वाहन चलाते है। कुल मिलाकर शहर की तुलना में ग्रामीण समाज शासन की सुविधाओं से वँचित है। भारत अभी भी गाँव में बसता है। भारत को मजबूत करने के लिए गाँव को आत्मनिर्भर बनाना बहुत जरुरी है। \

देश उसमे बसने वाले नागरिकों से ही मजबूत होता है। भारत की संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित “हम भारत के लोग” का मूल पात्र भारत का आम नागरिक है। यह हकीकत है किसी भी राष्ट्र की मजबूती का पैमाना उस राष्ट्र का आमनागरिक ही है। सुशिक्षित नागरिक, जागरूक समाज और मजबूत देश के निर्माण में सहायक है। जब हम भारत को दुनियाँ में महाशक्ति के रुप में देखना चाहते है तो इसके लिए आम नागरिक का मजबूत और जागरूक होना बेहद जरुरी है। आचार्य चाणक्य के अनुसार राष्ट्र की रक्षा केवल सेना नहीं, बल्कि नागरिकों का साहस, विवेक और अनुशासन करता है।
-नरेंद्र तिवारी ‘स्वतंत्र लेखक’-

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