श्रीराम मंदिर के वीर रक्षक : पण्डित देवीदीन पाण्डे
अयोध्या की पावन धरा पर, जहाँ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ, वहाँ सदियों से राम मंदिर की रक्षा के लिए अनेक वीरों ने अपना बलिदान दिया। ऐसे ही एक महान योद्धा थे पण्डित देवीदीन पाण्डे।
सनेथू गांव, अयोध्या के रहने वाले पण्डित देवीदीन पाण्डे का जन्म एक सम्मानित सर्यूपारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे एक कर्मकांडी पुरोहित थे। शास्त्रों का अध्ययन, पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ और लोगों को धार्मिक मार्गदर्शन देना ही उनका दैनिक कार्य था। उनकी आँखों में हमेशा भगवान राम के प्रति अटूट भक्ति झलकती थी।
लेकिन जब इतिहास का सबसे काला अध्याय लिखा जा रहा था, तब उनकी नियति ने उन्हें पुरोहित से योद्धा बना दिया।
मुगल आक्रमण
सन् 1528 के आसपास, बाबर के सेनापति मीर बाकी के नेतृत्व में मुगल सेना राम मंदिर को ध्वस्त करने के उद्देश्य से अयोध्या की ओर बढ़ी। मंदिर की प्राचीन गगनचुंबी शिखर को गिराने और उस पवित्र भूमि पर मस्जिद बनाने की उनकी मंशा थी।
जब यह खबर सनेथू गांव तक पहुँची, तो पण्डित देवीदीन पाण्डे का खून खौल उठा। उन्होंने अपना पुरोहित वाला चोला उतार फेंका और कहा —
“जब धर्म पर संकट आए, तब शास्त्रों की रक्षा तलवार से करनी पड़ती है।”
उन्होंने आसपास के ब्राह्मणों और क्षत्रियों को एकत्र किया। जो लोग कभी पूजा-पाठ करते थे, वही अब हथियार उठाने को तैयार हो गए। पण्डित जी स्वयं आगे बढ़े और मुगल सेना का सामना करने के लिए तैयार हुए।
महायुद्ध का आरंभ
युद्ध का मैदान भयानक था। मुगल सेना भारी संख्या में थी — घुड़सवार, तोपें, तीर और तलवारें। लेकिन पण्डित देवीदीन पाण्डे की अगुवाई में छोटी-सी हिंदू सेना डटकर लड़ी।
पण्डित जी की तलवार मानो बिजली की तरह चमक रही थी। उन्होंने एक-एक करके मुगल सैनिकों को मार गिराना शुरू कर दिया। उनकी फुर्ती, शौर्य और राम-भक्ति का जोश अद्भुत था।
कहा जाता है कि उस विकराल युद्ध में *पण्डित देवीदीन पाण्डे ने अकेले ही 700 मुगल सैनिकों को अपने हाथों से काट डाला। चारों ओर लाशों के ढेर लग गए। इतिहास गवाह है कि उस युद्ध में कुल *1,74,000 लाशें गिरी थीं। खून की नदियाँ बहने लगीं। धूल और धुएँ में भी पण्डित जी का सिंहनाद गूँजता रहा — “जय श्री राम!”
वीरता का चरम क्षण
युद्ध अपने चरम पर था। पण्डित जी पूरी तरह घायल हो चुके थे, फिर भी वे रुकने वाले नहीं थे। तभी एक मुगल सैनिक चुपके से उनके पीछे पहुँचा और अपनी तलवार से जोरदार वार किया।
तलवार इतनी तेजी से चली कि पण्डित जी का ऊपरी सिर कटकर दो भागों में फट गया। खून उनके चेहरे पर बहने लगा।
लेकिन महान योद्धा रुके नहीं।
उन्होंने तुरंत अपने गमछे को सिर पर बाँध लिया, खून को रोकने की कोशिश की और फिर से युद्ध में कूद पड़े। यह दृश्य देखकर मुगल सैनिक भी भयभीत हो गए। एक ब्राह्मण पुरोहित, जिसका सिर फटा हुआ है, फिर भी तलवार चलाए जा रहा है — यह अद्भुत दृश्य था।
पण्डित जी लड़ते रहे। एक के बाद एक वार झेलते रहे। शरीर पर सैकड़ों घाव हो चुके थे। आखिरकार, अत्यधिक रक्तस्राव और चोटों के कारण वे वहीं धराशायी हो गए।
वीरगति को प्राप्त करते हुए उन्होंने राम-नाम का जाप किया और अपने प्राण त्याग दिए।
अमर बलिदान
पण्डित देवीदीन पाण्डे की यह वीरता आज भी अयोध्या की मिट्टी में बसी हुई है। उन्होंने साबित कर दिया कि ब्राह्मण केवल शास्त्रों का ज्ञाता नहीं, बल्कि जब समय आए तो वह तलवार भी उठा सकता है।
उनकी कहानी हमें सिखाती है कि धर्म की रक्षा के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहना चाहिए।
आज जब श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बन चुका है, तो हमें उन वीर शहीदों को याद करना चाहिए जिन्होंने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।






