पीलीभीत। स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली अब तमाशा बनकर रह गई है। यहाँ अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटरों के खिलाफ की गई कार्रवाई आंखों में धूल झोंकने से ज्यादा कुछ नजर नहीं आ रही। मंगलवार को जिस लाव लश्कर के साथ दो बड़े अल्ट्रासाउंड सेंटरों को नियमों की धज्जियां उड़ाने के आरोप में सील किया गया था. गुरुवार आते आते उन पर लगे सरकारी ताले रहस्यमयी तरीके से खोल दिए गए। विभाग के इस यू-टर्न ने पूरे जिले के प्रशासनिक हलकों में खलबली मचा दी है। गौरतलब है कि मंगलवार को सीएचसी अधीक्षक डॉ. मनीष राज शर्मा और नायब तहसीलदार ऋषिकांत दीक्षित की संयुक्त टीम ने बालाजी और उत्तम अल्ट्रासाउंड सेंटर पर अचानक धावा बोला था।
जांच के दौरान जो हकीकत सामने आई, वह रोंगटे खड़े करने वाली थी। केंद्रों पर विशेषज्ञ डॉक्टर नदारद थे और अप्रशिक्षित टेक्नीशियन खुलेआम जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे थे। पीसीपीएनडीटी एक्ट के इस गंभीर उल्लंघन पर टीम ने तत्काल दोनों सेंटरों को सील कर नोटिस चस्पा कर दिया था। हैरानी की बात तो यह है कि जिस सेंटर पर टेक्नीशियन अवैध रूप से जांच करते पकड़े गए, उन्हें सुधार का मौका दिए बिना ही दोबारा खोलने की हरी झंडी दे दी गई। गुरुवार सुबह सीएचसी प्रभारी ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि सीएमओ साहब के निर्देश पर सील खोली गई है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या चंद घंटों में वे सेंटर रातों रात वैध हो गए? क्या वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति हो गई? या फिर पर्दे के पीछे कोई बड़ा खेल हुआ है? सूत्र बताते हैं कि इन सेंटरों के सीसीटीवी कैमरों में वह सारा काला चिट्ठा कैद है, जिसमें डॉक्टर की गैर मौजूदगी में टेक्नीशियन रिपोर्ट तैयार करते और मरीजों से मोटी रकम वसूलते साफ देखे जा सकते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग और अवैध सेंटर संचालकों के बीच गहरी सांठगांठ है। यही कारण है कि कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है और धरातल पर अवैध कारोबार फिर से फलने फूलने लगता है।
पूरनपुर की जनता अब सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग को कठघरे में खड़ा कर रही है। लोगों का कहना है कि अगर बिना योग्यता के गलत रिपोर्ट दी गई और किसी मरीज की जान चली गई, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? मांग उठ रही है कि इन सेंटरों की पिछले कई महीनों की सीसीटीवी फुटेज खंगाली जाए और नियमों को ताक पर रखने वाले केंद्रों के लाइसेंस हमेशा के लिए निरस्त किए जाएं। स्वास्थ्य विभाग की इस सील और रिलीफ वाली नीति ने कानून के इकबाल पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस गंभीर लापरवाही पर क्या कड़ा कदम उठाता है।






