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खनिज: नही थम रहा मनमानी का सिलसिला

पैलानी साड़ी 77 बबेरू की मर्का 1 में खनिज नियम सरका, तेरा,इटवा,भदावाल, रिसौरा ने भी नियमो से मुख फेरा

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Tuesday, December 2, 2025

Minerals: The process of arbitrariness continues unabated

राजकुमार पाठक की कलम से
बांदा/
वैसे तो जिले की सभी तहसीलों के अंतर्गत चलने वाली बालू खदानों में मनमानी का आलम इजाफे पर है लेकिन इन दिनों कुछ खदाने आम आदमी की आवाज से लगा कर मीडिया की सुर्खियों में इस क़दर छाई हुई है कि शिकायतो और आरोपों की आवाजे दब कर रह गई है। चर्चा में पैलानी तहसील की साड़ी 77 और बबेरू की मर्का खंड 1 सहित नरैनी और अतर्रा तहसील के घेरे में चलने वाली इटवा, तेरा ब, भदावल और रिसौरा में प्रतिबंधित पोकलैंड मशीनों सहित एन जी टी नियमो सहित अन्य खनिज नियमों को धता बता कर कारोबार करने में अमादा है और स्थानीय प्रशासन के जिम्मेदार आंख पर पट्टी बांधे अनदेखी पर अमादा है। इस सत्र में एक माह से लगातार चल रहे नदियों के खनिज व्यापार से स्थानीय किसान खेत खलिहान सब परेशान है।

अबकी बार नवंबर माह शुरू होते ही जिले की नदियों में खंडवार खनिज व्यापार शुरू होते हुए मनमानी की कथा व्यथा का इजहार कहीं शिकायतो तो कहीं आरोपों कहीं खबरों के रूप में लगातार सुर्खियां बना है लेकिन इसके बावजूद भी रोक थाम के नाम पर जिम्मेदार व्यवथा द्वारा ऐसे कोई कठोर कदम नहीं उठाए जा सके जिससे मनमानी पर लगाम लग सके , नतीजन खनिज कारोबारी और उनके सिस्टम।का मनमानी पताका ताल ठोक कर फहरा रहा है।

फिल्हाल सुर्खियों में पैलानी के अंतर्गत आने वाली केन नदी की साड़ी खदान से लगाकर बबेरू की मर्का खंड 1 की ओर से जो खबरे आ रही है उनकी माने तो न केवल प्रतिबंधित मशीनों से स्थानीय कामगारों के काम छीने जा रहे है बल्कि सरकार द्वारा निगरानी के लिए लगाई गई तीसरी आंख की दिशा और दशा बदल कर जल धारा के अंदर से बालू की खुदाई करके कारोबार को अंजाम देने के साथ तक्को की एक लंबी फौज भी जगह जगह तैनात की है है जिससे कोई खदान तक पहुंचने से पहले जानकारी में आ जाए। ऐसे ही हालातो से नरैनी तहसील की तेरा ब (पथरा) व इटवा, भदावल, महुटा और रिसौरा में भी खनन नियमों पर ढाए जाने वाले जुल्मोसितम की कहानी चर्चा बन कर रह गई है।

गौर तलब यह है कि खनिज कारोबार पर अंकुश और निगरानी के लिए जिला खनिज अधिकारी से लगा कर राजधानी में बैठे उच्चाधिकारियों के हाथ में कमान किंडर है लेकिन नियंत्रण के नाम पर इसे लोग नाकाम बताने के साथ यह भी कहते है कि सरकारी निगरानी का कोई ओर छोर नही है, जिससे खनिज कारोबारी बे लगाम हो कर अपने तरीके से सरकार के नियमो को रौंदते हुए अपने अपने मंसूबे पूरे करने जुटे है। उधर स्थानीय निवासी कहते है कि रोकथाम न लगाने के कारण जहां बे नियम कारोबार ज़ारी है वहीं पट्टा क्षेत्रफल से इधर उधर और मानक गहराई से ज्यादा खोदकर कहीं जलधारा से तो कहीं बाहर से बालू की खुदाई करके रात के अंधेरे में कारोबार को बेहिचक अंजाम दिया जा रहा है।

खनिज पर वरिष्ठ पत्रकार के बेबाक बोल

बांदा/ जनपद की तहसील से लेकर प्रदेश व देश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्र पत्रिकाओं में अपनी कलम की लेखनी से धाक जमाने वाले वरिष्ठ पत्रकार आत्माराम त्रिपाठी से जब जिले में चल रहे खनिज कारोबार को लेकर हुई वार्ता अनुसार आज जनपद बालू कारोबारियो के हवाले हो चुका है। जिले की नदियों की छाती चीरी जा रही है, गांवों की सांसें अवरुद्ध हो रही हैं, किसान परेशान है, जगह जगह आरोपों का अंबार है, जहां कही स्कूली बच्चे हैरान है तो कहीं राहगीरों को दुर्घटनाओं का भय है। बीते दिवस। रविवार को तिंदवारी क्षेत्र के ऊसरा पुरवा में श्रद्धालुओं की दबी जबान निकली आवाज भी खनिज कारोबार की एक पहचान है। उन्होंने कहा कि ओवरलोड वाहनों की गर्दा ने भंडारे में प्रसाद को भी धूल से बेस्वाद कर दिया और तो और सड़को पर निकले वाले ओवरलोड ट्रकों का आतंक दिन-रात मौत बांट रहा है। यह सब हो रहा है खुलेआम, बेखौफ, दिनदहाड़े और जिम्मेदारी की। चुप्पी जनता का सवाल बन कर रह गई है..? स्थानीय प्रशासन मौन है…!

क्योंकि काली कमाई का खेल ऊपर तक चल रहा है, यह हर जुबान पर है। वो बेखौफ कहते है कि जसपुरा, पैलानी, मटौंध, बबेरू, नरैनी, अतर्रा ऐसे इलाके है जहां सड़को से ओवरलोडग प्रेशर हॉर्न बजाते हर समय निकलते रहते हैं।सड़को पर ट्रक दिन-रात दहाड़ते हैं, गांव की गलियां कांपती हैं, धूल का गुबार छा जाता है, लेकिन न प्रशासन सुनता है, न जनप्रतिनिधि दिखते हैं। जिन्होंने वोट लेकर कुर्सी हथियाई, वे आज बालू की अनदेखी के साथ कारोबार के संबल जैसे कहे जा रहे है और सबसे शर्मनाक तमाशा पत्रकारों के साथ होता है। लिखो तो कुछ लोग कहते हैं – “कुछ नही मिला होगा, नहीं तो क्यों लिखता..!.?” और अगर न लिखो तो कहते हैं – “बिक गया, पैसा खा गया!” अरे, यही अधिकारी, यही नेता, यही ठेकेदार, यही आम आदमी जब अपनी बात अखबार में छपवाना चाहता है, जब कोई गड्ढा, बिजली, पानी, राशन की खबर डलवानी होती है, तब यही लोग फोन घनघनाते हैं – “भैया लिख दो, आवाज उठा दो!” जरा सोचिए, जिस चौथे स्तंभ को आप दिन-रात गाली देते हो, उसी के दम पर आपकी कुर्सी चमकती है। उसी की वजह से आवाम की आवाज दिल्ली तक पहुंचती है।
बस एक सवाल है – यह लूट कब तक चलेगी? कब तक खनिज कारोबारियो और मिलीभगत करने वाले अफसर- नेता नदियों का खून पीते रहेंगे..? कब तक पत्रकारों को गाली देकर अपनी काली कमाई छुपाते रहोगे..? जागो..! नही तो जनता जाग जायेगी और तब एक मुसीबत की तस्वीर खड़ी हो सकती है

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