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सुपर फूड के रूप में वैश्विक ग्लोबल प्रोडक्ट बना मखाना

देशों में सुपर फूड के नाम पर इसकी बिक्री काफी बढ़ गई है जिसके कारण लोगों द्वारा इसकी मांग बढ़ गई

EDITED BY: DAT BUREAU

UPDATED: Monday, November 24, 2025

Makhana has become a global product as a super food.

अजय कुमार/सहरसा

बिहार। मिथिला कोसी व सीमांचल में होने वाली मखाने की खेती से व्यवसाय और किसानों की अब आय बढ़ने की उम्मीद जगी है।पाश्चात्य देशों में सुपर फूड के नाम पर इसकी बिक्री काफी बढ़ गई है। जिसके कारण लोगों द्वारा इसकी मांग बढ़ गई है।जिलें के सत्तर कटैया प्रखंड स्थित तुलसियाही गांव के मखाना वायवसायी नवीन साह ने बताया कि मखाने की खेती में काफी मेहनत पड़ती है।

वही कच्चे माल के रूप में तालाब या झील से प्राप्त मखाना तैयार करने में बहुत ही मेहनत और जद्दोजहद करनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि तालाब से पहले बीज के रूप में गुड़ी निकाला जाता है फिर उसे गर्म कर 24 घंटे के लिए छोड़ दिया जाता है। तत्पश्चात उसे पुनः गर्म कर कठोर चीज से उसे फोड़ा जाता है। जिसमें से सुंदर और पौष्टिक आहार के रूप में मखाना प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि मिथिला में शरद पूर्णिमा कोजागरा के उत्सव में इसका जमकर प्रयोग किया जाता है।

मखाना को अमृत तुल्य माना गया है। वहीं अब जी टैग मिलने के कारण पूरे विश्व में इसकी प्रसिद्धि फैली है। जिसके कारण अनेक देश मे मखाने की मांग काफी बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि कच्चे माल के रूप में जब गुड़ी निकाली जाती है। तो उससे तैयार मखाना विभिन्न प्रकार के क्वालिटी में निकलता है।उन्होंने बताया कि सबसे अच्छा मखाना 6 सूत को माना गया है जिसकी कीमत भी सबसे अधिक रहती है।

उन्होंने बताया कि मखाने की उपज काफी बहुत पैदावार होने के कारण इस बार रेट काफी काम हो गया है। स्थानीय स्तर पर जो मखाना विगत वर्ष 500 से ₹700 में बिक्री होती थी वही मखाना अब 1000 से ₹1200 तक की बिक्री होलसेल में की जा रही है। उन्होंने बताया कि महानगर की बड़े बड़े व्यापारी मखाना व्यवसायी से संपर्क कर रहे हैं। ऐसे में उम्मीद है कि आने वाले दिनों में किसान एवं व्यवसाईयों को काफी लाभ प्राप्त होगा।

उन्होने बताया कि मखाना की खेती तालाबों, झीलों या पानी जमा होने वाले खेतों में की जाती है। जिसमें नर्सरी तैयार करने के बाद रोपाई की जाती है। इसकी खेती के लिए नवंबर-दिसंबर में बीज बोना, फरवरी-मार्च में रोपाई और अक्टूबर-नवंबर में कटाई होती है। एक एकड़ में लगभग 10-12 क्विंटल तक उपज हो सकती है। 

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