राजकुमार पाठक
बांदा। एक ओर सरकार 33 प्रतिशत वन क्षेत्र का लक्ष्य निर्धारित कर पर्यावरण संरक्षण के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर बांदा जिले में वन विभाग की कथित ‘कारस्तानी’ के चलते जंगलों का अस्तित्व खतरे में है। चित्रकूट के अलग होने के बाद बांदा के पास जो सीमित वन क्षेत्र बचा था, वह अब रसूखदारों और अवैध कब्जाधारियों की भेंट चढ़ रहा है। शहर से सटे दुरेंडी और गंछा के जंगलों में जिस तरह अवैध निर्माण हो रहे हैं, उसने विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ताजा मामला शहर से बिल्कुल सटे दुरेंडी वन क्षेत्र का है। सूत्रों के मुताबिक, एकलव्य महाविद्यालय के समीप वन भूमि पर अवैध रूप से पक्के मकान तान दिए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस अतिक्रमण की सूचना क्षेत्रीय कर्मचारियों से लेकर जिले के आला अधिकारियों तक को दी गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल ‘मौन’ हाथ लगा। वन भूमि पर सीना ताने खड़े ये मकान विभाग की उदासीनता का जीवंत प्रमाण हैं।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि विभाग हर साल करोड़ों की लागत से वृहद पौधरोपण का अभियान तो चलाता है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। यदि विभाग केवल पुराने लगाए गए पौधों का संरक्षण कर ले और अतिक्रमण की ओर ध्यान दे, तो जिले की तस्वीर बदल सकती है। राहगीरों और ग्रामीणों का आरोप है कि जिम्मेदारों ने ‘आंखों पर पट्टी’ बांध रखी है, जिससे जंगल का दायरा सिमटता जा रहा है और कंक्रीट का जाल फैलता जा रहा है।
कभी चित्रकूट के साथ होने पर बांदा का वन क्षेत्र काफी समृद्ध माना जाता था। विभाजन के बाद बांदा के हिस्से आए जंगलों की सुरक्षा करना तो दूर, विभाग अपनी जमीन बचाने में भी नाकाम साबित हो रहा है। दुरेंडी में हुए इन अवैध कब्जों पर अब सबकी नजरें टिकी हैं कि क्या शासन-प्रशासन इस पर कोई ठोस कार्रवाई करेगा या फिर वन भूमि इसी तरह खुर्द-बुर्द होती रहेगी। “यदि वन विभाग अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए एक बार नक्शे के साथ मौके का मुआयना कर ले, तो अवैध कब्जे की परतें अपने आप खुल जाएंगी।” स्थानीय निवासी और वहीं वन व प्रयावरण प्रेमी कार्यवाही के इंतज़ार में है अब देखते है कि आगे होता है क्या..?..!




