ब्यूरो चीफ विपिन सिंह चौहान फर्रूखाबाद
फर्रूखाबाद । शिवभक्ति, राष्ट्रप्रेम और सैन्य सेवाभाव की त्रिवेणी में डूबी दिखी याकूबपुर की युवा टोली पांचालघाट श्रावण मास में शिवभक्तों की भक्ति जहां आसमान छू रही है, वहीं फर्रुखाबाद जनपद में युवाओं की एक टोली ने धर्म, राष्ट्र और सेवा के अद्वितीय समन्वय से एक नई मिसाल पेश की है।
जनपद के याकूबपुर गांव से आए 25 युवाओं का जत्था, देश को “हिंदू राष्ट्र” घोषित करने और गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिलाने की मांग के साथ डाक कांवड़ यात्रा पर रवाना हुआ है।पांचालघाट पर गंगा स्नान के पश्चात सभी युवाओं ने एक साथ हर हर महादेव के जयघोष के साथ यात्रा का शुभारंभ किया। यह जत्था शिवधाम गोला गोकर्णनाथ के लिए दौड़ते हुए रवाना हुआ है।
शिव भक्ति के साथ राष्ट्रभक्ति का अनूठा संकल्प इस विशेष जत्थे का नेतृत्व कर रहे सनी ठाकुर ने बताया,हमारी डाक कांवड़ यात्रा केवल भोलेनाथ की भक्ति नहीं है, यह एक संकल्प है — हिंदू राष्ट्र के निर्माण और गौमाता को राष्ट्रीय गौरव दिलाने का। आज जब हमारी सांस्कृतिक पहचान को बार-बार चुनौती दी जा रही है, तब युवाओं को आगे आना ही होगा।
“सनी ने कहा कि यह उनकी पहली डाक कांवड़ यात्रा है, लेकिन यह शुरुआत है एक बड़े आंदोलन की, जिसमें आस्था और सामाजिक चेतना दोनों शामिल हैं।सेना भर्ती के लिए तैयार हो रही टोली इस जत्थे की विशेषता यह है कि सभी 25 युवा भारतीय सेना में भर्ती के लिए जी-जान से मेहनत कर रहे हैं। सुबह 4 बजे से दौड़, व्यायाम और शारीरिक अभ्यास करना इनका रोज का हिस्सा है। सनी ठाकुर कहते हैं,हमारे गांव में पहले बहुत लोग सेना में थे, लेकिन अब बाहर जाकर बस गए।
हम चाहते हैं कि फौज का जज्बा गांव में फिर से लौटे। हमारी टोली यही संदेश भी ले जा रही है — देशसेवा सबसे बड़ी पूजा है।हिंदू राष्ट्र और गौ रक्षा: विचारधारा या जन आंदोलन।युवाओं की इस टोली की मांगें सिर्फ धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं हैं। इनका उद्देश्य एक विचारधारा को जनआंदोलन में बदलना है। युवाओं का मानना है कि जब गाय करोड़ों लोगों की आस्था की प्रतीक है, तो उसे राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिलना ही चाहिए।
इनका यह भी तर्क है कि भारत की संस्कृति और परंपरा में गौ माता का स्थान सर्वोपरि है, और जब देश की पहचान की बात आती है, तो हिंदू राष्ट्र की घोषणा इस पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करेगी।कांवड़ यात्रा का रास्ता: चुनौतियों से भरा लेकिन उत्साह अडिग 120 किलोमीटर की यह डाक कांवड़ यात्रा रातभर चलेगी। जत्थे के युवाओं ने बताया कि हाईवे पर तेज रफ्तार वाहनों के बीच दौड़ना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन आस्था, संकल्प और राष्ट्रप्रेम के आगे थकावट या डर का कोई स्थान नहीं है।
सभी युवाओं ने सफेद टी-शर्ट पहनी थी, जिस पर “भोले” लिखा हुआ था। कंधों पर भगवा गमछा, सिर पर साफा और पैरों में जोश, ये युवा हर हर महादेव के नारे लगाते हुए पूरे रास्ते उत्साह बिखेरते नजर आए।क्या कहता है समाज।स्थानीय लोगों, दुकानदारों और मंदिरों के पुजारियों ने भी इन युवाओं की पहल की सराहना की।
एक दुकानदार ने कहा,आजकल के युवा अगर कांवड़ यात्रा के साथ देश और गाय के लिए सोच रहे हैं, तो यह नई पीढ़ी का जागरण है। ये छोटी शुरुआतें ही बड़ा बदलाव लाती हैं।”हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे संकल्पों को राजनीतिक रंग देने से बचना चाहिए, क्योंकि आस्था और राष्ट्र का विषय बहुत संवेदनशील होता है।समापन: जहां भक्ति और विचार साथ चलते हैं।
श्रावण मास की यह डाक कांवड़ यात्रा महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि युवाओं की चेतना का प्रतीक बन गई है। जहां भगवान शिव का आशीर्वाद पाने की इच्छा है, वहीं भारत माता की सेवा और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का अदम्य संकल्प भी।यह जत्था साबित करता है कि आज का युवा भक्ति में केवल दीप नहीं जलाता, बल्कि बदलाव की मशाल भी उठाता है।





