रूदौली ( अयोध्या ) परसन पुरवा मजरे बारी का वो घर पिछले 19 दिनों से जैसे ठहर सा गया था। दरवाज़े पर बैठा एक बूढ़ा पिता हर आहट पर चौंक जाता… शायद इस बार उसका बेटा आ गया हो। लेकिन हर बार उम्मीद टूटती रही।सुरेंद्र लोधी, जो सऊदी अरब में मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का सहारा बने हुए थे, उनके निधन की खबर 5 अप्रैल को जैसे ही घर पहुंची, पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन असली दर्द तो तब शुरू हुआ, जब उनका पार्थिव शरीर भी अपने वतन नहीं लौट सका।बुजुर्ग पिता अपने बेटे को आखिरी बार देखने के लिए दर-दर भटकते रहे। कभी अधिकारियों के दफ्तर, कभी जनप्रतिनिधियों के दरवाजे… लेकिन हर जगह सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं।9 अप्रैल को पवन राजपूत द्वारा सोशल मीडिया पर वीडियो जारी किए जाने के बाद मामला धीरे-धीरे लोगों की नजरों में आया और हलचल बढ़ी। क्षेत्र के मौजूदा भाजपा विधायक भी पीड़ित परिवार के घर पहुंचे, उन्होंने ढांढस बंधाया और अधिकारियों से बात भी की, लेकिन इंतजार की घड़ियां कम नहीं हुईं।उधर घर के आंगन में हर दिन एक ही सवाल गूंजता रहा “क्या हमारा बेटा कभी घर लौटेगा?”इसी बीच जब मामला समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक अब्बास अली जैदी उर्फ रुश्दी मियां तक पहुंचा, तो उन्होंने इसे सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक परिवार का दर्द समझा। वह खुद पीड़ित परिवार के घर पहुंचे, उनके आंसू पोंछे और मदद का भरोसा दिया।रुश्दी मियां ने न सिर्फ आर्थिक सहायता दी, बल्कि संबंधित अधिकारियों से लगातार संपर्क में रहकर पूरी प्रक्रिया को तेज कराया। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो पार्थिव शरीर को भारत लाने का पूरा खर्च खुद उठाएंगे और उन्होंने अपना वादा निभाया भी।सऊदी में जहां सुरेंद्र का पार्थिव शरीर रखा गया था, वहां मेराज अंसारी को भेजा गया। उन्होंने अल बिसा में रुककर जावेद तेली की मदद से जरूरी कागजी प्रक्रिया पूरी करवाई। इस पूरे दौरान हर कदम पर रुश्दी मियां की नजर और प्रयास जुड़े रहे।आखिरकार 19 दिनों की लंबी, थकाऊ और दर्दभरी लड़ाई के बाद आज वह पल आया… जब सुरेंद्र अपने घर लौटे लेकिन इस बार खामोश।लखनऊ एयरपोर्ट पर खुद रुश्दी मियां अपने साथियों और मृतक के पिता रामदेव लोधी के साथ मौजूद रहे। जब पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, तो पूरे इलाके में सन्नाटा और सिसकियां एक साथ गूंज उठीं।जिस बेटे के लौटने की आस में पिता हर दिन दरवाजे तक आते थे… आज वही बेटा आया, लेकिन कंधों पर।इस पूरे घटनाक्रम ने एक ओर सिस्टम की धीमी रफ्तार को उजागर किया, तो दूसरी ओर इंसानियत की एक मिसाल भी पेश की जहां एक इंसान ने दूसरे के दर्द को अपना समझा। मृतक के पिता रामदेव लोधी लखनऊ एयरपोर्ट डेड बॉडी रिसीव करने पहुंचे। आज परसन पुरवा में हर जुबान पर एक ही बात है “देर से सही, लेकिन बेटे को घर लाने वाला कोई तो था…”






